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अध्याय 1: प्रारंभिक (Preliminary - धारा 1 और 2)

 अध्याय 1: प्रारंभिक (Preliminary - धारा 1 और 2)

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) का अध्याय 1 इस कानून का आधार स्तंभ है। यह अध्याय कानून के संक्षिप्त नाम, इसके अधिकार क्षेत्र (विस्तार), लागू होने की तिथि और अधिनियम के भीतर प्रयुक्त होने वाले सभी महत्वपूर्ण कानूनी शब्दों की परिभाषाओं को निर्धारित करता है।

इस अधिनियम की पृष्ठभूमि संविधान के अनुच्छेद 15 के खंड (3) में निहित है, जो राज्य को बालकों के लिए विशेष उपबंध करने की शक्ति देता है। इसके अतिरिक्त, भारत सरकार ने 11 दिसंबर, 1992 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा अंगीकृत बालकों के अधिकारों से संबंधित अभिसमय (UN Convention on the Rights of the Child) को स्वीकार किया था, जिसके तहत बच्चों के सर्वोत्तम हितों की रक्षा करना और उनके लैंगिक शोषण को रोकना अनिवार्य है।

अध्याय 1 के अंतर्गत आने वाली दोनों धाराओं का संपूर्ण विधिक विवरण नीचे दिया गया है:


धारा 1: संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ (Short Title, Extent and Commencement)

  • संक्षिप्त नाम: इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम "लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012" (The Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012) है।
  • अधिनियम का विस्तार: इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है। (विशेष संशोधन: पूर्व में यह कानून जम्मू-कश्मीर राज्य को छोड़कर पूरे देश में लागू था, लेकिन 2019 के अधिनियम संख्यांक 34 की धारा 95 और पांचवीं अनुसूची द्वारा 31 अक्टूबर 2019 से "जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय" शब्दों का लोप कर इसे वहां भी पूरी तरह विस्तारित कर दिया गया है)
  • प्रारम्भ: यह कानून उस तारीख से प्रवृत्त (लागू) हुआ जिसे केंद्रीय सरकार ने राजपत्र (Official Gazette) में अधिसूचना द्वारा नियत किया। (यह कानून 14 नवंबर 2012 से पूरे देश में प्रभावी रूप से लागू है)।

धारा 2: परिभाषाएं (Definitions)

अधिनियम की धारा 2(1) के तहत इस कानून में प्रयुक्त होने वाली प्रमुख शब्दावलियों को स्पष्ट किया गया है ताकि व्याख्या को लेकर कोई संशय न रहे:

  • 2(1)(क) "गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमला" (Aggravated Penetrative Sexual Assault): इसका वही अर्थ होगा जो इस अधिनियम की धारा 5 में दिया गया है।
  • 2(1)(ख) "गुरुतर लैंगिक हमला" (Aggravated Sexual Assault): इसका वही अर्थ होगा जो इस अधिनियम की धारा 9 में दिया गया है।
  • 2(1)(ग) "सशस्त्र बल या सुरक्षा बल": इससे संघ के सशस्त्र बल (थल सेना, नौसेना, वायु सेना) या अधिनियम की अनुसूची में निर्दिष्ट सुरक्षा बल या पुलिस बल अभिप्रेत हैं।
  • 2(1)(घ) "बालक" (Child): पोक्सो अधिनियम के तहत "बालक" से ऐसा कोई भी व्यक्ति अभिप्रेत है जिसने अठारह (18) वर्ष की आयु पूरी नहीं की है (अर्थात् 18 वर्ष से कम आयु का कोई भी लड़का या लड़की)।
  • 2(1)(घक) "बालक संबंधी अश्लील सामग्री" (Child Pornographic Material): (यह परिभाषा 2019 के संशोधन अधिनियम संख्यांक 25 द्वारा 16 अगस्त 2019 से स्थापित की गई है)
    इसके अंतर्गत किसी बालक को शामिल करते हुए लैंगिक संबंध बनाने या किसी भी प्रकार के यौन आचरण का कोई भी दृश्य चित्रण शामिल है। इसमें कोई भी फोटो, वीडियो, डिजिटल या कंप्यूटर द्वारा बनाई गई ऐसी आकृतियां शामिल हैं जो वास्तविक बालक के समान दिखाई देती हैं, भले ही उन्हें तकनीकी रूप से सृजित, रूपांतरित (morphed) या परिवर्तित किया गया हो, लेकिन वह देखने में बालक का चित्र प्रतीत होती हो।
  • 2(1)(ङ) "घरेलू संबंध" (Domestic Relationship): इसका वही अर्थ होगा जो 'घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005' की धारा 2(च) में परिभाषित है।
  • 2(1)(च) "प्रवेशी लैंगिक हमला" (Penetrative Sexual Assault): इसका वही अर्थ होगा जो इस अधिनियम की धारा 3 में दिया गया है।
  • 2(1)(छ) "विहित" (Prescribed): इससे अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा निर्धारित विषय अभिप्रेत हैं।
  • 2(1)(ज) "धार्मिक संस्था" (Religious Institution): इसका वही अर्थ होगा जो 'धार्मिक संस्था (दुरुपयोग निवारण) अधिनियम, 1988' में परिभाषित है।
  • 2(1)(झ) "लैंगिक हमला" (Sexual Assault): इसका वही अर्थ होगा जो इस अधिनियम की धारा 7 में दिया गया है।
  • 2(1)(ञ) "लैंगिक उत्पीड़न" (Sexual Harassment): इसका वही अर्थ होगा जो इस अधिनियम की धारा 11 में दिया गया है।
  • 2(1)(ट) "साझी गृहस्थी" (Shared Household): इससे वह गृहस्थी अभिप्रेत है जहाँ अपराध का आरोपी व्यक्ति पीड़ित बालक के साथ घरेलू नातेदारी (relationship) में रहता है या किसी भी समय एक साथ रह चुका है।
  • 2(1)(ठ) "विशेष न्यायालय": इससे धारा 28 के अधीन निर्दिष्ट किया गया कोई विशेष न्यायालय अभिप्रेत है।
  • 2(1)(ड) "विशेष लोक अभियोजक" (Special Public Prosecutor): इससे धारा 32 के अधीन नियुक्त किया गया कोई अभियोजक अभिप्रेत है।

धारा 2(2) - अवशिष्ट परिभाषाएं (Residual Definitions):

इस अधिनियम में प्रयुक्त ऐसे शब्द और पद जिन्हें यहाँ सीधे परिभाषित नहीं किया गया है, लेकिन वे निम्नलिखित कानूनों में परिभाषित हैं, उनके वही अर्थ माने जाएंगे जो उन संबंधित कानूनों में दिए गए हैं:

  1. भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC)
  2. दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC)
  3. किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015
  4. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act)


अध्याय 1 (धारा 2) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):

1. Independent Thought Vs. Union of India (2017) - [बालक की आयु (धारा 2(1)(घ)) पर ऐतिहासिक निर्णय]:

  • निर्णय: इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न था कि क्या किसी नाबालिग विवाहित लड़की के साथ उसके पति द्वारा बनाए गए संबंध को बलात्कार माना जा सकता है, जबकि आईपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 के तहत पत्नी की आयु सीमा 15 वर्ष थी। सर्वोच्च न्यायालय ने बाल अधिकारों की रक्षा करते हुए स्पष्ट फैसला सुनाया कि यौन अपराधों के मामलों में 18 वर्ष से कम आयु का प्रत्येक व्यक्ति 'बालक' है। कोर्ट ने पोक्सो अधिनियम की धारा 2(1)(घ) के तहत तय की गई 18 वर्ष की आयु सीमा को सर्वोपरि माना और आईपीसी के उस अपवाद को असंवैधानिक घोषित करते हुए विवाहित बालिकाओं के लिए भी न्यूनतम आयु सीमा को बढ़ाकर 18 वर्ष कर दिया।

2. Just Rights for Children Alliance Vs. S. Harish & Anr. (2024) - [बाल अश्लील सामग्री (धारा 2(1)(घक)) पर मील का पत्थर]:

  • निर्णय: यह हालिया निर्णय पोक्सो की धारा 2(1)(घक) के तहत परिभाषित "बालक संबंधी अश्लील सामग्री" (CSAM) के भंडारण और देखने से संबंधित है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कानूनी व्यवस्था दी कि बाल अश्लील सामग्री को केवल डाउनलोड करना, देखना या अपने डिजिटल उपकरणों (जैसे फोन या कंप्यूटर) में सहेजना भी पोक्सो अधिनियम के तहत एक जघन्य अपराध है। न्यायालय ने माना कि इस तरह की सामग्रियों का केवल व्यक्तिगत उपभोग भी बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन शोषण और उनके अधिकारों के हनन को बढ़ावा देता है, इसलिए इसे 'निजता' या 'व्यक्तिगत उपयोग' के दायरे में रखकर दोषमुक्त नहीं किया जा सकता।

3. Jarnail Singh Vs. State of Haryana (2013) - [आयु निर्धारण (धारा 2(2)) पर मार्गदर्शक निर्णय]:

  • निर्णय: पोक्सो मामलों में पीड़ित या अभियुक्त की सही आयु का निर्धारण करना सबसे महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसी पर मामले की अधिकारिता निर्भर करती है। चूंकि धारा 2(2) के तहत अपरिभाषित पदों के लिए किशोर न्याय (JJ) अधिनियम के प्रावधान लागू होते हैं, सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में स्पष्ट किया कि पोक्सो मामलों में भी आयु के निर्धारण के लिए किशोर न्याय अधिनियम और उसके नियमों में तय की गई वैधानिक प्रक्रिया (मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट, स्कूल प्रवेश रजिस्टर की जन्मतिथि, और अंत में वैज्ञानिक अस्थि परीक्षण या Bone Ossification Test) का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए।


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