धारा 4: प्रवेशी लैंगिक हमले के लिए दंड (Punishment for Penetrative Sexual Assault)
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) के अध्याय 2 की धारा 4 में 'प्रवेशी लैंगिक हमले' (जिसे धारा 3 में परिभाषित किया गया है) के लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया है। 2019 के संशोधनों के बाद इस धारा को तीन उप-धाराओं में विभाजित कर सजा को और अधिक कठोर तथा पीड़ित के प्रति संवेदनशील बना दिया गया है।
धारा 4 के विस्तृत प्रावधान:
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धारा 4(1) - सामान्य प्रवेशी लैंगिक हमले के लिए दंड: जो कोई भी व्यक्ति किसी बालक (18 वर्ष से कम आयु) पर प्रवेशी लैंगिक हमला करेगा, उसे दोनों में से किसी भी भांति (कठोर या सादा) के कारावास की सजा दी जाएगी, जिसकी अवधि कम से कम 10 वर्ष होगी। (2019 के संशोधन से पूर्व यह न्यूनतम अवधि 7 वर्ष थी)। इस सजा को आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, और साथ ही अपराधी जुर्माने से भी दंडनीय होगा।
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धारा 4(2) - 16 वर्ष से कम आयु के बालक के साथ अपराध के लिए कठोर दंड: (इसे 2019 के संशोधन द्वारा जोड़ा गया है) यदि कोई व्यक्ति 16 वर्ष से कम आयु के किसी बालक पर प्रवेशी लैंगिक हमला करता है, तो उसे अत्यंत कठोर दंड दिया जाएगा। इसके लिए न्यूनतम सजा 20 वर्ष का कारावास होगी, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है। इस उपधारा में "आजीवन कारावास" को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, जिसका अभिप्राय उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल (remainder of natural life) के लिए कारावास है। इसके अतिरिक्त, अपराधी जुर्माने का भी दायी होगा।
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धारा 4(3) - जुर्माने का भुगतान और पीड़ित का पुनर्वास: (इसे भी 2019 के संशोधन द्वारा जोड़ा गया है) इस धारा के तहत जो भी जुर्माना लगाया जाएगा, वह न्यायोचित (just) और युक्तियुक्त (reasonable) होना चाहिए। इस जुर्माने की राशि का संदाय (भुगतान) सीधे पीड़ित को किया जाएगा, ताकि उस राशि का उपयोग पीड़ित के चिकित्सा व्ययों (medical expenses) की पूर्ति और उसके पुनर्वास (rehabilitation) के लिए किया जा सके।
धारा 4 (सजा और जुर्माने के प्रावधानों) के संदर्भ में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
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Alakh Alok Srivastava Vs. Union of India (2018): इस ऐतिहासिक जनहित याचिका (PIL) में सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चों (विशेषकर छोटी बच्चियों) के साथ होने वाले जघन्य यौन अपराधों पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। न्यायालय के इसी कड़े रुख और दिशा-निर्देशों की पृष्ठभूमि में, भारत सरकार ने 2019 में पोक्सो अधिनियम में संशोधन किया। इसी संशोधन के परिणामस्वरूप धारा 4(2) और 4(3) को शामिल कर 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के साथ प्रवेशी लैंगिक हमले के लिए आजीवन कारावास (शेष प्राकृतिक जीवन तक) जैसे अत्यंत कठोर और निवारक (Deterrent) प्रावधान जोड़े गए।
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State of Madhya Pradesh Vs. Vikram Das (2019) (Principle of Minimum Mandatory Sentence): सर्वोच्च न्यायालय ने पोक्सो अधिनियम (विशेषकर धारा 4 जैसे दंड प्रावधानों) के तहत स्पष्ट किया है कि अदालतों को विधायिका द्वारा निर्धारित "न्यूनतम अनिवार्य सजा" (Minimum Mandatory Sentence) के सिद्धांत का सख्ती से पालन करना चाहिए। न्यायालयों को सहानुभूति या किसी अन्य आधार पर सजा को वैधानिक न्यूनतम सीमा (जैसे धारा 4(1) में 10 वर्ष या धारा 4(2) में 20 वर्ष) से कम करने का कोई विवेकाधिकार नहीं है। बाल यौन शोषण के मामलों में सजा निवारक होनी चाहिए।
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Jarnail Singh Vs. State of Haryana (2013) & State of Madhya Pradesh Vs. Anoop Singh (2015): चूंकि धारा 4(2) के तहत 20 साल की न्यूनतम सजा के लिए पीड़ित की उम्र घटना के समय 16 वर्ष से कम होना साबित करना एक अनिवार्य आवश्यकता है, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'उम्र निर्धारण' (Age Determination) के लिए स्थापित सिद्धांत यहाँ अत्यंत प्रासंगिक हो जाते हैं। इन फैसलों के अनुसार, शैक्षणिक प्रमाण पत्र (जैसे 10वीं कक्षा का सर्टिफिकेट या स्कूल में प्रवेश की जन्मतिथि) को सर्वोपरि माना जाता है, और उसके अभाव में ही अस्थि-परीक्षण (Ossification Test/Medical Evidence) पर निर्भर किया जा सकता है।
