Chapter II Of BNS 2023 (Punishments) Explained

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अध्याय II: दंड (Chapter II: Of Punishments) के प्रावधानों का, और समझेंगे कि भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के व्यापक संदर्भ (larger context) में यह अध्याय इतना महत्वपूर्ण क्यों है।

क्रिमिनल लॉ में जब कोई अपराध साबित हो जाता है, तो अगला और सबसे महत्वपूर्ण चरण ‘सजा’ (Sentencing) का होता है। BNS का अध्याय II (धारा 4 से लेकर 13 तक) इसी सजा का पूरा ‘Hardware’ और ‘Mathematics’ तय करता है। यह अध्याय न केवल दंडात्मक (Retributive) बल्कि सुधारात्मक (Reformative) न्यायशास्त्र का भी बेहतरीन संतुलन है।

आइए इसे बिलकुल क्रमानुसार (Serially) और Clause-wise डिकोड करते हैं:

1. दंड के प्रकार (Types of Punishments) – धारा 4:

जैसा कि हमने पहले चर्चा की थी, संहिता के तहत 6 प्रकार के दंड दिए जा सकते हैं: (a) मृत्यु (Death), (b) आजीवन कारावास (Imprisonment for life), (c) कारावास (कठोर या सादा), (d) संपत्ति का समपहरण (Forfeiture of property), (e) जुर्माना (Fine), और (f) सामुदायिक सेवा (Community Service)।

  • BNS Context: सामुदायिक सेवा (Community Service) को पहली बार छोटे अपराधों (petty offences) के लिए एक सजा के रूप में पेश किया गया है, जो एक बहुत ही प्रगतिशील कदम है।

2. दंडादेश का लघुकरण (Commutation of Sentence) – धारा 5:

उपयुक्त सरकार (Appropriate Government) अपराधी की सहमति के बिना भी BNS के तहत किसी भी सजा को दूसरी सजा में बदल (commute) सकती है।

  • यहाँ ‘उपयुक्त सरकार’ से तात्पर्य केंद्र सरकार (मृत्युदंड या केंद्रीय कानूनों के मामलों में) और राज्य सरकार (राज्य की शक्ति के अधीन मामलों में) से है।

3. सजा की गणना का सुनहरा नियम (Fractions of Terms of Punishment) – धारा 6:

Judicial Exams का यह सबसे पसंदीदा सवाल है! जब भी सजा के अंशों (fractions) की गणना करनी हो (जैसे सजा आधी करना या एक-चौथाई करना), तो ‘आजीवन कारावास’ (Life Imprisonment) को बीस वर्ष (20 years) के कारावास के बराबर माना जाएगा।

  • सुप्रीम कोर्ट ने Gopal Vinayak Godse v. State of Maharashtra में स्पष्ट किया था कि ‘आजीवन कारावास’ का मतलब प्राकृतिक जीवन का अंत है, लेकिन जब धारा 6 (या पुरानी IPC की धारा 57) के तहत गणितीय गणना (mathematical calculation) की बात आती है, तो इसे 20 साल माना जाता है।

4. सजा की प्रकृति – धारा 7:

यह धारा न्यायालय को यह शक्ति देती है कि यदि किसी अपराध में कठोर या सादा, दोनों में से किसी भी प्रकार के कारावास का प्रावधान है, तो जज साहब यह तय कर सकते हैं कि पूरी सजा कठोर होगी, पूरी सादा होगी, या कुछ हिस्सा कठोर और बाकी सादा होगा।

5. जुर्माना और डिफ़ॉल्ट नियम (Fine & Default Sentences) – धारा 8:

यह धारा मजिस्ट्रेट की शक्तियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

  • जहाँ जुर्माने की राशि नहीं लिखी है, वहाँ जुर्माना असीमित (unlimited) हो सकता है, लेकिन अत्यधिक (excessive) नहीं होना चाहिए
  • यदि कोई व्यक्ति जुर्माना या ‘सामुदायिक सेवा’ करने में विफल (default) रहता है, तो उसे अतिरिक्त जेल की सजा काटनी होगी।
  • The 1/4th Rule: डिफ़ॉल्ट की सजा उस अपराध के लिए तय अधिकतम कारावास के एक-चौथाई (one-fourth) से अधिक नहीं हो सकती।
  • Scale of Imprisonment (यदि अपराध केवल जुर्माने/सामुदायिक सेवा का है): ऐसे मामलों में डिफ़ॉल्ट सजा हमेशा ‘सादा’ (simple) होगी। यह ₹5000 तक के लिए अधिकतम 2 महीने, ₹10000 तक के लिए अधिकतम 4 महीने, और अन्य मामलों में अधिकतम 1 वर्ष तक हो सकती है।
  • जुर्माने को सजा सुनाने के 6 साल के भीतर वसूला जा सकता है, और अपराधी की मृत्यु होने पर भी उसकी संपत्ति इस दायित्व से मुक्त नहीं होती।

6. कई अपराधों से मिलकर बने अपराध की सजा – धारा 9:

जब कोई कार्य कई हिस्सों से मिलकर बना हो, और हर हिस्सा अपने आप में एक अपराध हो, तो अपराधी को केवल एक ही सजा दी जाएगी, जब तक कि स्पष्ट रूप से अलग प्रावधान न हो।

  • Classic Example: मान लीजिए ‘A’, ‘Z’ को डंडे से 50 बार मारता है। यहाँ A ने हर एक प्रहार (blow) से अपराध किया है। लेकिन ‘A’ को 50 अलग-अलग प्रहारों के लिए 50 साल की सजा नहीं मिलेगी; उसे पूरी मारपीट के लिए केवल एक ही सजा मिलेगी।

7. संदेह का लाभ (Doubtful Offences) – धारा 10:

जब यह साबित हो जाए कि व्यक्ति ने अपराध किया है, लेकिन यह संदेह हो कि कई अपराधों में से उसने कौन सा अपराध किया है, तो उसे उस अपराध की सजा मिलेगी जिसकी सजा सबसे कम (lowest punishment) है।

8. एकांत परिरोध (Solitary Confinement) – धारा 11 और 12:

BNS में एकांत परिरोध का प्रावधान कठोर कारावास वाले मामलों में दिया जा सकता है, लेकिन कुल मिलाकर यह तीन महीने (3 months) से अधिक नहीं हो सकता।

  • Memory Trick (The 1-2-3 Scale):
    • अगर सजा 6 महीने तक है = 1 महीने का एकांत परिरोध।
    • अगर सजा 6 महीने से 1 साल तक है = 2 महीने का एकांत परिरोध।
    • अगर सजा 1 साल से अधिक है = 3 महीने का एकांत परिरोध।
  • धारा 12 कहती है कि इसे एक बार में 14 दिन से ज्यादा लागू नहीं किया जा सकता। यदि कुल सजा 3 महीने से ज्यादा है, तो 1 महीने में अधिकतम 7 दिन ही एकांत परिरोध दिया जाएगा।

9. पूर्व दोषसिद्धि पर वर्धित दंड (Enhanced Punishment) – धारा 13:

यदि कोई व्यक्ति BNS के अध्याय X (सिक्के, करेंसी-नोट आदि से संबंधित) या अध्याय XVII (संपत्ति के विरुद्ध अपराध) के तहत 3 वर्ष या उससे अधिक की सजा वाले अपराध के लिए पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है, और वह दोबारा उन्हीं अध्यायों का अपराध करता है, तो उसे आजीवन कारावास या 10 साल तक की जेल की सजा दी जाएगी।

Conclusion: So my dear aspirants, always remember! अध्याय I अगर कानून की डिक्शनरी है, तो अध्याय II इस बात का मैनुअल (Manual) है कि अदालतें अपराधियों को सजा सुनाते समय गणित (Mathematics of Penology) का उपयोग कैसे करेंगी। Keep your concepts crystal clear and keep revising!

What is Section 4 of BNS 2023 ?

भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 5

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