धारा 29: कतिपय अपराधों के बारे में उपधारणा (Presumption as to certain offences)
पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 7 ("विशेष न्यायालय") के अंतर्गत आने वाली धारा 29 इस कानून की सबसे सख्त और अभूतपूर्व धाराओं में से एक है. यह धारा सामान्य आपराधिक कानून के मूल सिद्धांत—"जब तक दोष सिद्ध न हो जाए, तब तक अभियुक्त को निर्दोष माना जाए"—को उलट देती है और पोक्सो मामलों में 'दोष की विधिक उपधारणा' (Presumption of Guilt/Reverse Burden of Proof) का सिद्धांत लागू करती है.
धारा 29 के विधिक प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण:
1. धारा का मूल पाठ और क्रियान्वयन:
अधिनियम की धारा 29 के अनुसार, जहां किसी व्यक्ति पर इस अधिनियम के अधीन निम्नलिखित अपराधों को करने, उनका दुष्प्रेरण (Abetment) करने, या उन्हें करने का प्रयत्न (Attempt) करने के लिए मुकदमा (अभियोजन) चलाया जाता है:
- धारा 3 (प्रवेशी लैंगिक हमला)
- धारा 5 (गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमला)
- धारा 7 (लैंगिक हमला)
- धारा 9 (गुरुतर लैंगिक हमला)
वहां विशेष न्यायालय यह उपधारणा करेगा (Shall Presume) कि उस व्यक्ति ने, यथास्थिति, वह अपराध किया है, उसका दुष्प्रेरण किया है, या उसे करने का प्रयत्न किया है.
2. अभियुक्त पर साबित करने का भार (Burden of Proof on Accused):
यह उपधारणा तब तक बनी रहेगी "जब तक कि इसके विरुद्ध साबित नहीं कर दिया जाता है" (Unless the contrary is proved). इसका सीधा अर्थ यह है कि:
- न्यायालय मुकदमे की शुरुआत में ही यह मानकर चलेगा कि अभियुक्त दोषी है.
- अब यह अभियुक्त की जिम्मेदारी (Onus/Burden) है कि वह अदालत के समक्ष ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करके स्वयं को निर्दोष साबित करे.
धारा 29 (दोष की उपधारणा) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अग्रणी निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. Maheshwar Tigga Vs. State of Jharkhand (2020) - [आधारभूत तथ्यों को साबित करने का सिद्धांत]:
- निर्णय: इस ऐतिहासिक मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 29 के तहत दोष की उपधारणा स्वचालित (automatic) रूप से लागू नहीं होती है. न्यायालय ने व्यवस्था दी कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) को पहले "आधारभूत तथ्य" (Foundational Facts) संदेह से परे साबित करने होंगे.
- विधिक सिद्धांत: इसका अर्थ यह है कि अभियोजन को पहले यह साबित करना होगा कि कथित घटना घटित हुई थी और उसमें अभियुक्त की संलिप्तता के प्राथमिक साक्ष्य मौजूद हैं. एक बार जब अभियोजन इन आधारभूत तथ्यों को स्थापित कर देता है, केवल तभी धारा 29 के तहत दोष की उपधारणा सक्रिय होगी और साबित करने का भार अभियुक्त पर स्थानांतरित होगा. अभियोजन केवल धारा 29 के भरोसे आरोपी को सीधे दोषी नहीं ठहरा सकता.
2. Dharmendra Sinh @ Chiku Vs. State of Gujarat (2021) - [उपधारणा को खंडित करने का मानक (Standard of Rebuttal)]:
- निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय में व्याख्या की कि अभियुक्त को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए किस स्तर के साक्ष्य की आवश्यकता होती है. न्यायालय ने माना कि जहाँ अभियोजन को अपना मामला "संदेह से परे" (Beyond Reasonable Doubt) साबित करना होता है, वहीं अभियुक्त को धारा 29 की उपधारणा को खारिज करने के लिए केवल "संभावनाओं की प्रबलता" (Preponderance of Probability) को साबित करना होगा. अर्थात, यदि अभियुक्त अदालत में यह स्थापित कर देता है कि उसके निर्दोष होने की संभावना अधिक है, तो धारा 29 की उपधारणा खंडित (rebutted) मानी जाएगी.
3. Attorney General for India Vs. Satish (2021) - [धारा 29 और चिकित्सीय/वैज्ञानिक साक्ष्य]:
- निर्णय: इस बहुचर्चित मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि पीड़ित बालक का बयान विश्वसनीय है, तो केवल चिकित्सीय साक्ष्य (Medical Evidence) के अभाव में धारा 29 की उपधारणा को खारिज नहीं किया जा सकता. यदि बच्चा अदालत में सुसंगत बयान देता है, तो न्यायालय धारा 29 के तहत आरोपी को दोषी मानेगा, जब तक कि आरोपी यह साबित न कर दे कि वह निर्दोष है.
