धारा 17: दुष्प्रेरण के लिए दंड (Punishment for abetment)
पोक्सो अधिनियम, 2012 के अध्याय 4 के अंतर्गत आने वाली धारा 17 दुष्प्रेरण (Abetment) के अपराध के लिए दंड का निर्धारण करती है। यह धारा यह सुनिश्चित करती है कि अपराध को प्रत्यक्ष रूप से अंजाम देने वाले मुख्य अपराधी के साथ-साथ उसे उकसाने, साजिश रचने या उसकी मदद करने वाले सह-अपराधी को भी उतनी ही सख्त सजा मिले।
धारा 17 के विधिक प्रावधान:
-
समान दंड का सिद्धांत: जो कोई भी व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का दुष्प्रेरण (Abetment) करेगा, यदि वह दुष्प्रेरित कार्य (यानी वह अपराध जिसके लिए उकसाया या मदद की गई थी) उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया जाता है, तो वह व्यक्ति उसी दंड से दंडित किया जाएगा जो उस मूल अपराध के लिए कानून में उपबंधित है।
- उदाहरण के लिए: यदि कोई व्यक्ति किसी बालक के विरुद्ध "गुरुतर प्रवेशी लैंगिक हमला" (धारा 5) करने के लिए किसी को उकसाता है या उसकी जानबूझकर सहायता करता है, और वह अपराध घटित हो जाता है, तो दुष्प्रेरण करने वाले व्यक्ति को भी धारा 6 के तहत वही सजा (न्यूनतम 20 वर्ष का कारावास या मृत्युदंड) मिलेगी जो मुख्य अपराधी को दी जाएगी।
-
विधिक स्पष्टीकरण (Explanation): कोई भी कृत्य या अपराध "दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप" किया गया तब माना जाता है, जब वह कृत्य:
- उस उकसाहट (instigation) के परिणामस्वरूप किया गया हो,
- उस आपराधिक षड्यंत्र (conspiracy) के अनुसरण में किया गया हो, या
- उस साशय सहायता (intentional aid) की मदद से किया गया हो, जिससे वह दुष्प्रेरण घटित होता है।
धारा 17 (दुष्प्रेरण के दंड) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय (Leading Supreme Court Judgments):
1. State of Maharashtra Vs. Bandu @ Shripad Budhe (2018) - [दुष्प्रेरण की गंभीरता पर ऐतिहासिक निर्णय]:
- निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में पोक्सो अधिनियम की धारा 16 और 17 के कानूनी प्रभाव की विस्तृत व्याख्या की। न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि बाल यौन शोषण जैसे जघन्य अपराधों में मूकदर्शक बने रहना या अपराधी को किसी भी रूप में प्रत्यक्ष या परोक्ष सहायता (जैसे कमरे की व्यवस्था करना, बच्चे को डराना, या माता-पिता को प्रभावित करना) प्रदान करना अत्यंत गंभीर है। न्यायालय ने माना कि ऐसे सहयोगी भी मुख्य अपराधी के समान ही समाज के लिए खतरनाक हैं, इसलिए उन्हें धारा 17 के तहत मूल अपराध के लिए निर्धारित पूर्ण और समान दंड से दंडित किया जाना न्यायसंगत है।
2. Ganesan Vs. State (2020) - [षड्यंत्र और दुष्प्रेरण की सह-दोषसिद्धि]:
- निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में माना कि यदि कई लोग मिलकर किसी बच्चे के खिलाफ लैंगिक अपराध की योजना बनाते हैं (आपराधिक षड्यंत्र), तो भले ही उनमें से केवल एक व्यक्ति ने बच्चे पर हमला किया हो, योजना में शामिल अन्य सभी सह-आरोपी धारा 17 के तहत दुष्प्रेरण के दोषी होंगे और उन्हें मुख्य कृत्य के लिए निर्धारित समान न्यूनतम अनिवार्य सजा भुगतनी होगी।
