भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 104 (Section 104) विशेष रूप से आजीवन कारावास की सजा काट रहे किसी दोषी द्वारा की गई हत्या के दंड (Punishment for murder by life-convict) से संबंधित है।
इस कानूनी प्रावधान के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जो पहले से ही आजीवन कारावास (life imprisonment) की सजा के अधीन है और वह हत्या (murder) का अपराध करता है, तो उसे निम्नलिखित में से किसी एक सजा से दंडित किया जाएगा:
- मृत्युदंड (Death): न्यायालय ऐसे अपराधी को सबसे कठोर सजा अर्थात् मृत्युदंड दे सकता है।
- आजीवन कारावास (Imprisonment for life): यदि न्यायालय मृत्युदंड नहीं देता है, तो उसे आजीवन कारावास की सजा दी जाएगी, जिसका इस धारा के अंतर्गत स्पष्ट अर्थ है—उस व्यक्ति के शेष प्राकृतिक जीवन (remainder of that person's natural life) तक की कैद।
धारा 104 का महत्व और विस्तृत व्याख्या: यह धारा न्याय प्रणाली में एक अत्यंत सख्त दृष्टिकोण को दर्शाती है। इसका उद्देश्य उन खतरनाक अपराधियों से सख्ती से निपटना है जिन पर पहले से दी गई गंभीर सजा (आजीवन कारावास) का कोई सुधारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है। चूँकि ऐसा व्यक्ति पहले से ही उम्रकैद की सजा काट रहा है, इसलिए किसी अन्य अवधि के सामान्य कारावास की सजा का उसके लिए कोई विशेष निवारक (deterrent) अर्थ नहीं रह जाता है।
इस प्रावधान में "प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक" (remainder of natural life) वाक्य का उपयोग बहुत महत्वपूर्ण है। इसका सीधा मतलब यह है कि इस सजा के तहत दोषी को भविष्य में किसी भी प्रकार की क्षमा या सजा में छूट (remission) का लाभ नहीं मिलेगा और उसे अपनी आखिरी सांस तक अनिवार्य रूप से जेल की सलाखों के पीछे ही रहना होगा। यह कानून समाज की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करने और एक सजायाफ्ता अपराधी द्वारा दोबारा हत्या जैसा जघन्य अपराध करने की स्थिति में कोई रियायत न देने के उद्देश्य से बनाया गया है।
